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Home » नहीं टूटने देना चाहिए था अभिमान, तिरंगा है मान : Delhi Kisan Tractor Rally

नहीं टूटने देना चाहिए था अभिमान, तिरंगा है मान : Delhi Kisan Tractor Rally

faridabadnews24By faridabadnews24January 27, 2021No Comments4 Mins Read

नई दिल्ली :  लाल किला की प्राचीर पर जहां हर वर्ष स्‍वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ध्‍वजारोहण कर देश को गौरव से अभिभूत करते हैं। गणतंत्र दिवस के दिन 26 जनवरी, 2021 को इसी ऐतिहासिक स्‍थल पर संविधान और तिरंगे का निरादर हुआ। जिस लाल किला परिसर में लगे पोल से तिरंगा आजादी की खुशबू से लोकतंत्र को पुष्पित पल्‍लवित करता आया है, वहीं पर निशान साहिब और किसान संयुक्त मोर्चा का झंडा फहरा दिया गया। कोई भी धर्म और संगठन तिरंगे के मान से ऊपर नहीं हो सकता और न ही आज तक हुआ है।

तार-तार हुई मर्यादा

संविधान का मखौल बनाने वाले मर्यादा को तार तार करने वाले ये किसान तो नहीं हो सकते, न ही ये तय ट्रैक्‍टर मार्च था। क्‍या किसानों ने पुलिस से रजामंदी लेने से पहले यही रणनीति तय की हुई थी? क्‍या उनके आंदोलन की यही परिभाषा थी? कहां गई शांति, कहां गया जय जवान, जय किसान? जहां किसान भी थे और दूसरी तरफ जवान भी थे। जवान हाथ जोड़ रहे थे और किसान उग्र हो रहे थे। जाहिर है दृश्‍य बिलकुल विपरीत था। तय रूट भी नहीं था, जिन ट्रैक्‍टर से किसान खेतों में फसल लहलहाता है। जो एक किसान की जमापूंजी है उसके सम्‍मान की निशानी है। वही ट्रैक्‍टर मंगलवार को लापरवाह हुआ। नियमों को खदेड़ते हुए सड़कों पर काल बने दौड़ रहे थे। बाकायदा स्‍टंट कर रहे थे। किसान उसी ट्रैक्‍टर पर बैठकर जवानों को गुर्रा रहे थे, घुड़की दिखा रहे थे, उन्‍हें कुचलने का प्रयास कर रहे थे। सचमुच ये किसान तो नहीं थे।निश्चित ही ये उपद्रवी थे, किसानों की लिबास में। डंडे, पत्‍थर, तलवारें एक किसान के हाथों का कहां शोभनीय उसके हाथ तो खेत में फसल सींचने को उठे, उसे देश की करोड़ों की आबादी तक पहुंचाने को उठे। आखिर इन उपद्रवियों को मौका किसने दिया? किसान दलों के मुखिया बने इन किसान संगठनों ने ही तो दिया, क्‍या अब योगेंद्र यादव, सतनाम सिंह पन्नू व सोहन सिंह पंडेर सरीखे किसान नेता जवाब दे पाएंगे जिन्‍होंने किसानों की आड़ लेकर किसानों का ही मजाक बना दिया। ऐसा तो नहीं होना चाहिए था। देश के मान पर तिरंगे के अभिमान पर तो यूं छींटे नहीं पड़ने चाहिए थे। गर्व से अभिभूत करने वाले इतिहास में ये काला पन्‍ना नहीं जुड़ना चाहिए था। ये अराजक तत्‍व हैं इनके लिए किसान कोई मायने नहीं रखता इनका उद्देश्‍य तो इतना ही है कि दंगा हो, गोली चले, खून खराबा हो, लोग मरें। पूरे ट्रैक्‍टर मार्च की योजना योगेंद्र यादव सरीखे लोगों ने बैठकर तैयार की थी किसी किसान ने नहीं।

अराजक तत्‍वों ने राष्‍ट्र का सिर झुका दिया

इतिहासकार प्रोफेसर कपिल कुमार के मुताबिक, हम सब जानते थे कि क्‍या होने वाला है, दिल्‍ली पुलिस अब कह रही है कि हमने ऐसे घटनाक्रम की उम्‍मीद नहीं की थी। कम से कम राजपथ के दायरे में तो ऐसे दुस्‍साहस पूर्ण घिनौने घटनाक्रम से बचाकर रखना चाहिए था। दिल्‍ली का केंद्र आइटीओ चौक तक किसानों का पहुंचना तो पुलिस के लिए सीधा संकेत था कि आगे क्‍या होने वाला है, तो थोड़ी तत्‍परता दिखानी चाहिए थी। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर देश में धीरे-धीरे ऐसी स्‍वरा भास्‍कर, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव सरीखे अराजकता फैलाने वाले सक्रिय हो रहे हैं इन्‍हें रोकने की जरूरत है। जो भी कुछ आज हुआ है इससे हर राष्‍ट्रवादी का सिर झुक गया है। हर कोई विचलित है। दुखी है कि आखिर राजनीति और अराजक तत्‍वों की पराकाष्‍ठा हर सीमा लांघकर उस ऐतिहासिक चौखट तक पहुंच गई। दरअसल ये सब सोच रहे हैं कि जैसे हजारों साल से छोटे-छोटे लोग यह सोचकर गद्दारी करते थे कि ऐसा करके दिल्‍ली के तख्‍त पर काबिज हो जाएंगे। ऐसे ही ये लोग सोच रहे हैं यह सिर्फ सत्‍ता की भूख है। प्रजातंत्र में जब कोई जनादेश से सरकार चुनकर आती है तो वह पांच साल के लिए ही होती है। विपक्ष को विपक्ष की भूमिका में रहकर काम करना चाहिए। लेकिन ये छोटे-छोटे दल उन्‍हीं गद्दारों की तरह रोज-रोज ऐसे उपद्रवी कारनामे कर रहे हैं, ऐसे कृत्‍यों से प्रजातंत्र में सरकार नहीं हटती बल्कि ऐसे देश विरोधी चेहरे सामने उभरकर आते हैं। जनादेश ही उनकी पहचान करता है और मतदान के वक्‍त इसका हिसाब भी करता है।

faridabadnews faridabadnews24 Shouldn't have broken the pride the tricolor is the value: Delhi Kisan Tractor Rally
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