
Reels Addiction: अब तक आपने कई तरह की लत के बारे में सुना होगा. लेकिन आज हम आपको सोशल मीडिया की एक ऐसी लत के बारे में बताते हैं, जो आपके जीवन पर बहुत बुरा असर डाल रही है. एक दौर था जब अखबारों के जरिए लोगों तक, लोगों की बात पहुंचती थी. फिर एक दौर आया, जब आवाज के माध्यम से लोगों की बात, लोगों तक पहुंचाई जाने लगी. इसके बाद एक ऐसा दौर आया जब लोगों की बात उनकी पहचान के साथ, देश के हर व्यक्ति तक पहुंचाई गई. लेकिन Communication के पिछले सभी दौर में कुछ चुनिंदा लोग ही, प्रसारण का काम करते थे. लेकिन इसके बाद अब दौर आया है Social Media का. Mass Communication की असली क्रांति तो अब आई है.
अब हर व्यक्ति के हाथ में Mobile Phone है, और उसमें internet के साथ-साथ शानदार कैमरा है. वो अपनी आंखों से देखी हर चीज, पूरी दुनिया को दिखा सकता है. उसे किसी और की मदद की जरूरत नहीं है. लोग अपने Mobile Videos या Reels के जरिए, अपने Talent का लोहा मनवा सकते हैं. Social Media reels इस मामले में सबसे ताकतवर माध्यम बन चुका है. लोग पूरे-पूरे दिन Reels देखने में बिता देते हैं.
यही नहीं पूरे दिन नई-नई Reels बनाने के Idea पर काम करते हैं. इनमें से कुछ Reels लोगों के काम की हैं, कुछ मनोरंजन करती हैं, कुछ ऐसी भी होती हैं, जो आपका Mood बेहतर बनाती हैं. लेकिन Reels देखने में पूरा-पूरा दिन बिता देना, आम लोगों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहा है. आज हम Social Media Reels देखने और बनाने वालों पर एक खास Report लेकर आए हैं. ये Report देश के हर उस युवा के लिए जरूरी है, जो Reels बनाने या देखने की लत की वजह से अपना मानसिक स्वास्थ्य खराब कर रहे हैं.
पहले ज्यादातर लोग बड़े पर्दे पर 3-3 घंटे की फिल्में देखकर मनोरंजन करते थे. उसके बाद टीवी पर आधे-आधे घंटे की टीवी सीरियल देखकर मनोरंजन करने लगे. इंटरनेट क्रांति के बाद यूट्यूब और वीडियो स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स पर 10 या 15 मिनट वाले वीडियो की भरमार आ गई, और लोग इन्हें पसंद भी करने लगे. लेकिन अब Reels का जमाना है.
हाथ में मोबाइल हो तो खाली समय में Reels देखते-देखते समय कब बीत जाता है. पता ही नहीं चलता. आपने खुद अपने मोबाइल फोन में सोशल मीडिया पर समय बिताने के घंटे चेक करेंगे तो आपको पता चलेगा कि दिन के ज्यादातर घंटे तो आपने मोबाइल फोन स्क्रोलिंग में ही बिता दिए थे. इसी वर्ष IIM अहमदाबाद ने सोशल मीडिया पर एक स्टडी की. इस स्टडी का नाम था ‘New Age Digital Media Consumption’.
इस स्टडी में पता चला कि हमारे देश में लोग अपने दिन के करीब 194 मिनट यानी 3 घंटे 14 मिनट सोशल मीडिया पर बिताते हैं. 24 घंटे में से सोने के 8 घंटे हटा दें, तो दिन का करीब 20 प्रतिशत समय तो लोग सोशल मीडिया पर ही बिता देते हैं. इस स्टडी से ये भी पता चला कि लोग 44 मिनट OTT प्लैटफॉर्म पर और 46 मिनट ऑनलाइन गेमिंग में समय बिताते हैं.
आपको जानकर हैरानी होगी कि इंस्टाग्राम पर एक दिन में 1 करोड़ 76 लाख घंटे की रील्स देखी जाती हैं. ये आंकड़ा केवल एक सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म का है. ये आंकड़ा रील्स के प्लैटफॉर्म टिकटॉक से 10 गुना कम है. टिकटॉक पर रोजाना 19 करोड़ 78 लाख घंटे की रील्स देखी जाती हैं. इसके अलावा फेसबुक, यूट्यूब और ना जाने कितने ही सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म हैं, जिनमें शॉर्ट्स या रील्स के नाम पर 90 सेकेंड के वीडियोज़ डाले और देखे जाते हैं. मोबाइल फोन पर सोशल मीडिया रील्स देखने या बनाने में अपना ज्यादातर समय बिताना…अब एक बुरी लत की तरह, देश के युवाओं को घेर रहा है. रील्स देखने में ज्यादा समय बिताना एक मानसिक रोग बनता जा रहा है.
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिसर्च के मुताबिक सोशल मीडिया पर रील्स देखने या बनाने की लत को वैज्ञानिक, Mass Psychogenic illness कह रहे हैं. इसे MPI भी कहा जाता है. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की इस रसिर्च के मुताबिक दिन में जरूरत से ज्यादा Video Streming प्लैटफॉर्म पर रहने वाले लोगों में भी Mass Psychogenic illness के लक्षण नजर आते हैं.
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस बीमारी से पीड़ित लोगों के अंदर कुछ खास आदतें आ जाती हैं, जैसे दूसरे लोगों के सामने बातचीत करते वक्त पैर हिलाते रहना. वैज्ञानिक इसको Hyper Active Response कह रहे हैं. इसके अलावा दूसरा लक्षण है ADHD यानी Attention Deficit Hyperactivity Disorder…इसका मतलब ये होता है कि जो लोग लंबे समय तक वीडियो या रील्स देखते हैं, वो लोग समय के साथ-साथ थोड़ी-थोड़ी देर में वीडियो बदलने लगते हैं. वो लंबे समय तक एक वीडियो पर नहीं टिकते, ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि इससे पीड़ित व्यक्ति के अंदर एकाग्रता की कमी हो जाती है. ऐसा व्यक्ति वीडियो ही नहीं, बल्कि किसी भी काम में एकाग्र नहीं हो पाता, बेचैन रहता है.
सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर चाहे आप फोटो डाल रहे हों, या फिर कोई रील, उसपर अगर लाइक्स ना आएं, कमेंट्स ना आएं, तो बुरा लगता है. दरअसल सोशल मीडिया के रील्स बनाने वालों को खुद के वीडियो से बहुत ज्यादा उम्मीदें रहती हैं. वो रील्स बनाने के बाद ये मानकर चलते हैं, कि उनकी रील्स, किसी सेलिब्रिटी की बनाई रील्स की तरह लोगों को पसंद आएंगी. लेकिन ऐसा ना होता देख, वो परेशान रहने लगते हैं. उनमें कई तरह के लक्षण दिखाई देने लगते हैं. जैसे, ऐसे लोग कुछ समय बाद Depression का शिकार हो जाते हैं. उनमें नींद की कमी, सिरदर्द, माइग्रेन जैसे लक्षण भी नजर आने लगते हैं.
Reels देखने की आदत पर गुजरात के अहमदाबाद की इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनविर्सिटी ने एक पिछले एक रिसर्च की थी. ये रिसर्च का मकसद ये जानना था कि लोग Reels बनाने या देखने में इतना समय क्यों लगाते हैं. इस रिसर्च में 18 से 36 वर्ष तक के लोगों को शामिल किया गया था. इस रिसर्च के मुताबिक 85 प्रतिशत लोगों का कहना था कि रील्स बनाने या देखने से लोगों को मनोरंजन मिलता है.
92 प्रतिशत लोगों का कहना था कि Reels बनाने से उनमें Self Rewarding Self Promotion की भावना आती है. उन्हें उपलब्धि का अहसास होता है. ये अहसास Likes, Comments और वीडियो शेयर के तौर पर होता है. 88 प्रतिशत लोगों का कहना था कि Reels वगैरह बनाने से वो Trendy महसूस करते हैं. यानी आज के जमाने के साथ चलने वाले महसूस करते हैं. वो मानते हैं कि आजकल यही चल रहा है तो ये करना ही होगा. इसीलिए वो सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं.
87 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वो अपने वीडियोज़, तस्वीरें या रील्स डालकर, उन्हें इस तरह सेव कर लेते हैं. 87 प्रतिशत लोग ऐसे भी थे जिनका मानना था कि Reels बनाने या देखने से वो कुछ पल के लिए अपनी जिम्मेदारियों या परेशानियों से दूर हो जाते हैं. ऐसे लोग इसे Escape plan की तरह देखते हैं. इस श्रेणी में महिलाओं की संख्या, पुरुषों से ज्यादा थी. 83 प्रतिशत लोग ऐसे भी थे जो कुछ नया करने या नया देखने की इच्छा लेकर Reels देखने या बनाने में समय बिताते हैं.
79 प्रतिशत लोग ऐसे भी थे जो कोई रील तो नहीं बनाते हैं. लेकिन वो दूसरों की पोस्ट इसलिए देखते हैं कि उनकी जिंदगी में क्या चल रहा है. फिर चाहे वो उनका करीबी हो या कोई सेलिब्रिटी. रील्स यानी ऐसे वीडियोज़ जो 1 से डेढ मिनट के होते हैं. कई लोग तो एक दिन में कई कई रील्स बनाते हैं. इनमें सेलिब्रिटी भी हैं और आम इंसान भी. कुछ की रील्स हिट हो जाती हैं तो कुछ की रील्स बिल्कुल नहीं पसंद की जातीं.
कई केस ऐसे भी होते हैं जिसमें किसी व्यक्ति की कोई एक रील हिट हो जाती है और अन्य फ्लॉप. वन टाइम वंडर वाले लोग, अक्सर अपनी अगली रील के हिट होने के चक्कर में कई तरह की रील्स बनाते हैं और लंबे समय तक हिट ना होने पर परेशान होने लगते हैं. दरअसल देश में एक खास मानसिकता वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है जो, रील्स में एक्टिंग करके,खुद को सेलिब्रिटी मान लेते हैं. ऐसे लोगों को मेडिकल भाषा में Narcissist की श्रेणी में डाला जा रहा है. ये ऐसे लोग जो Self Obsessed या खुद पर ही मोहित रहने वाले लोग.
दुनिया की कुल आबादी तकरीबन 800 करोड़ है, जिसमें इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोग 500 करोड़ हैं. यानी दुनिया में तकरीबन 63% लोगों के पास मोबाइल फोन है. इन 63 प्रतिशत लोगों में से 92 प्रतिशत लोग इंटरनेट को मोबाइल फोन पर इस्तेमाल कर रहे हैं यानी इंटरनेट यूज़र्स की संख्या मोबाइल फोन पर ज्यादा है. जहां तक भारत की बात है तो भारत में यूट्यूब देखने वालों की संख्या 46 करोड़ है. भारत में फेसबुक के 37 करोड़ यूजर्स हैं. भारत में इंस्टाग्राम के 33 करोड़ यूज़र्स हैं, जिनकी औसत उम्र 24 वर्ष है.
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की ही है. कई युवा तो ऐसे हो जो इंफ्ल्यूएंसर बनने की चाह में सोशल मीडिया पर अजीबो गरीब वीडियोज़ डालते हैं. कई तो रील्स बनाने के चक्कर में अपनी जान खतरे में डाल देते हैं. भारत में युवा आबादी सबसे ज्यादा है लेकिन डिजीटल लिट्रेसी वाली युवा आबादी कम है. तकनीकि के दौर में मोबाइल फोन से दूर नहीं रहा जा सकता है. लेकिन इसका कब,कितना और कैसे इस्तेमाल करना है, इसकी जानकारी लोगों को कम है.
यहां हम आपको एक बात साफ कर देना चाहते हैं, कि हम Reels बनाने या देखने के विरोधी नहीं हैं. हम यहां आपको ये बताना चाहते थे कि ‘अति’ हर चीज़ की बुरी होती है. पूरे पूरे दिन Reels देखना आपकी आंखों के लिए ही नहीं बल्कि आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है. ठीक इसी तरह से Reels को हिट बनाने के चक्कर में अपनी जान दांव पर लगाने वाले स्टंट करना भी खतरनाक है.
NEWS SOURCE : zeenews
