शुद्धता के कारण एक ओर जहां बाजार में पहाड़ी उत्पादों की मांग बढ़ गई है तो दूसरी ओर पहाड़ के कई परंपरागत फसलों के बीज तक नहीं मिल रहे हैं। पहाड़ की परंपरागत बासमती का बीज अब बाजारों में नहीं मिल रहा है। अकेले अपने दम पर घर से लेकर आंगन तक को महका देने वाला मालभोग केला अब नजर नहीं आता है। कमोवेश यही हाल बेहद तीखी परंतु अलग स्वाद को लेकर चखने को मजबूर करने वाली मिर्च का है।

पहाड़ में धान, गेहूं, दलहन, तिलहन सहित फलों की कुछ विशेष प्रजातियां होती थीं। इनका उत्पादन व्यापक तो नहीं होता था पर अपनी विशेषताओं को लेकर इन विशेष प्रजाति के बीजों की मांग काफी अधिक रहती थी। धान में राजमती, थापचीनी, स्यूड़ा, नानधानी और बासमती जैसे चावल रसोई में अपनी खुशबू बिखरते थे। वर्तमान में ये सभी प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। थोड़ा बहुत लाल धान भर ही नजर आता है। गांवों से पलायन के चलते इसका उत्पादन भी निरंतर घटता जा रहा है। इसका बीज तक मिलना भी मुश्किल हो चुका है।
धान के अलावा कौनी, गहत, बड़े आकार का भट सहित अन्य कई दलहन और तिलहन के परंपरागत बीज अब नजर नहीं आ रहे हैं। पहाड़ की काली राई भी लुप्त होने लगी है। इसका बीज भी ढूंढे नहीं मिल रहा है। फलों में पहाड़ की विशेष प्रजाति के मालभोग और तप्पसी केला इतिहास बन चुके हैं। भारत नेपाल सीमा पर काली नदी घाटी में उत्पादित होने वाला मालभोग केला पहले से ही दुर्लभ प्रजाति का था।
मात्र 2 से 3 इंच लंबा और कागज जैसे पतले छिलके वाला मालभोग केला खुशबू बिखेरता था। पेट की कई बीमारियों में इस अचूक दवा माना जाता था। विगत दो दशकों से अब यह दिखना भी बंद हो चुका है। इसके स्थान पर हजारा केला उत्पादित हो रहा है। इसी तरह नदी घाटी में उत्पादित तप्पसी केला अपनी विशेषताओं के कारण जाना जाता था। लंबे आकार के इस केले को तब स्थानीय लोग सिरदर्द, सर्दी जुकाम में गरम कर दवा के रूप में प्रयोग करते थे।
जहां मात्र बासमती होती थी वहां अब बीज भी उपलब्ध नहीं
तीन दशक पूर्व तक मात्र बासमती के लिए सुर्खियों में रहने वाले अस्कोट क्षेत्र के सूनाकोट गांव में अब बासमती का बीज तक उपलब्ध नहीं है। तीन दशक पूर्व तक इस गांव में धान के नाम पर मात्र बासमती का उत्पादन होता था। तीस वर्षो में ही स्थितियों ऐसी बदली की इस गांव में बीज के लिए भी बासमती नहीं है। गांव के प्रगतिशील काश्तकार राम सिंह खोलिया बताते हैं कि खेतों में एक बार फिर बासमती उत्पादन का निर्णय लिया। परंपरागत बीज नहीं मिलने पर पंतनगर जाकर बीज लाकर बोया है।
