फरीदाबाद : कोरोना संक्रमण के बीच औद्योगिक नगरी में बहुत कुछ बदल गया है। शहर के लेबर चौक पर खड़े होने वाले दिहाड़ी मजदूरों के घर तो खाने के लाले हैं। काम मिलने की उम्मीद में मजदूर किसी भी गाड़ी के रुकते ही उस पर ऐसे टूट पड़ते हैं कि उन्हें सड़क पर चलने वाले अन्य वाहन भी जैसे नजर नहीं आते। दो जून की रोटी के लिए काम की तलाश में घंटों चौराहों पर खड़े इन दिहाड़ी मजदूरों की हालत विगत छह माह के दौरान ही बदतर हो गई है। आज की तारीख में वह किसी भी दुर्घटना से नहीं डरते, उन्हें तो पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी जुटानी है, बस। अमर उजाला संवाददाता ने कोरोना काल के छह माह पूरे होने पर शुक्रवार सुबह बांके बिहारी मंदिर चौक पर खडे़े दिहाड़ी मजदूरों का हाल जाना :
कार के नीचे आते-आते बचा मजदूर
लेबर चौक पर मिस्त्री की तलाश में आए एक व्यक्ति ने जैसे ही वहां खड़े मजदूरों से मिस्त्री के बारे में पूछा तो सड़क के दूसरी तरफ खड़ा एक व्यक्ति वाहनों के बीच में से दौड़ता हुआ आया। सड़क पर उसे दौड़ता देख सामने से आ रहे एक कार चालक ने जोर से ब्रेक लगाए और चिल्लाया, मरेगा क्या? इस पर सड़क पर दौड़ते व्यक्ति ने हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए कहा, साहब शाम तक रोटी का जुगाड़ नहीं हुआ तो वैसे ही मर जाएंगे। इस पर कार चालक चुपचाप वहां से निकल गया।
घंटों करते हैं मजदूरी का इंतजार
रोज ही काम मिलने की उम्मीद में दिहाड़ी मजदूर घंटों चौराहे पर खाक छानते हैं। काम मिल जाए तो ठीक, नहीं मिलता तो दिनभर लेबर चौक पर बैठकर वापस लौट जाते हैं। लॉकडाउन के बाद से चौक पर मजदूरों की संख्या भी आधी रह गई है। अधिकांश अपने गांव चले गए हैं और अभी तक लौट कर नहीं आए। जो लौटे हैं वे बच्चों को गांव में ही छोड़ आए हैं। शहर के लेबर चौक पर अधिकतर यही हालात हैं।
छह माह पहले नहीं थे ऐसे हालात
औद्योगिक नगरी होने के कारण देश के हर हिस्से से यहां काम की तलाश में आते हैं। कोरोना काल से पहले यहां स्थितियां काफी बेहतर थीं। रोजगार की तलाश में आया व्यक्ति निराश नहीं लौटता था, मगर अब स्थितियां बदल गई हैं। लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे उद्योग पटरी पर लौट रहे हैं, मगर बहुतों की नौकरियों पर ग्रहण लग गया है। इसी तरह लेबर चौक पर खड़े मजदूर भी अब दिनभर काम की तलाश में रहते हैं।
दिहाड़ी मजदूरों से बात
एनआईटी 5 बांके बिहारी मंदिर के पास लेबर चौक पर काम मिलने की उम्मीद से बैठा सुरेश हाल ही में वाराणसी स्थित अपने पैतृक गांव से लौटकर आया है। सुरेश ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान वह भी पत्नी और बच्चों के साथ गांव लौट गया था। वहां भी कितने दिन बैठता। दो जून की रोटी के लिए बच्चों को वहीं छोड़कर खुद वापस आ गया है। बताता है कि लेबर चौक पर पहले 150-200 लोग काम के लिए सुबह ही खड़े हो जाते थे, मगर अब उसके आधे भी नहीं आते हैं। लॉकडाउन के दौरान अपने गांव गए लोग वापस लौटकर नहीं आए हैं।
बातचीत के बाद भी दिहाड़ी तय नहीं हो पाती
सुरेश के साथ ही बैठा बिरजू मकान शिफ्टिंग या फिर गोदाम से सामान चढ़ाने उतरवाने का काम करता है। बिरजू ने बताया कि लॉकडाउन से पहले दोपहर तक वे लोग दो से तीन जगह पर काम करके लौट आते थे। अब हालत यह है कि दो-तीन दिन में काम मिल जाए, वो भी गनीमत है। इसी दौरान स्कूटी सवार एक व्यक्ति मिस्त्री की तलाश में आए तो वहां बैठे मजदूरों ने उन्हें घेर लिया। बातचीत हुई, मगर दिहाड़ी तय नहीं होने पर स्कूटी सवार आगे चला गया।
