दिल्ली : बाहरी दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके में एक महिला स्टॉल लगाकर रोज लोगों को खाना खिलाती हैं। अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो वह आपको भूखा वापस नहीं जाने देंगी। उनका सामने से जवाब आएगा ‘खाना खा लो, जीवन में जब भी पैसे हों तब दे देना या मोबाइल नंबर ले जाओ, पैसे आने पर मन करे तो पेटीएम या फोनपे कर देना।’

पश्चिम विहार निवासी सरिता कश्यप को जरूरतमंदों को खाना खिलाकर सुकून मिलता है। सरिता घर चलाने के लिए पीरागढ़ी के सीएनजी पंप के पास अपनी स्कूटी पर राजमा-चावल व कढ़ी -चावल का ‘अपनापन’ नाम से स्टॉल लगाती हैं। वह हाफ प्लेट राजमा-चावल 40 रुपये में और फुल प्लेट 60 रुपये में ग्राहकों को देती हैं। अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो वह आपको भूखा नहीं जाने देंगी। खाना खिलाकर ही भेजेंगी। सरिता ने बताया कि वह सबको अपना बच्चा समझकर ही खाना खिलाती हैं। जब कोई भूखा खाना खा रहा होता है तो उनको लगता है कि उनकी बेटी ही खाना खा रही है।
बता दें कि सरिता की बेटी कॉलेज में पढ़ती है और वह अकेली ही उसका खयाल रखती हैं। सरिता ने बताया कि वह करीब 17 साल से ऑटोमोबाइल सेक्टर में नौकरी करती थी। वेतन भी अच्छा था, सभी जरूरतें पूरी हो रही थी, लेकिन सुकून नहीं था। इसलिए उन्होंने खुद का काम करने की ठानी और नौकरी छोड़ दी। फिर अपने लजीज राजमा बनाने के हुनर को उन्होंने लोगों तक पहुंचाना शुरू किया। लोगों को उनके राजमा-चावल का स्वाद इतना अच्छा लगा कि अब लोग घर पर खाना खाने के बाद भी उनके राजमा-चावल का स्वाद चखने आते हैं। इसके अलावा लोग कढ़ी चावल भी चाव से खाते हैं। सरिता ने बताया कि नौकरी के दौरान वह किसी जरूरतमंद की मदद नहीं कर पाती थी। अब वह जरूरतमंदों की हर संभव मदद करती हैं। इससे उनको इतना सुकून मिलता है कि कई बार तो खुशी से आंसू निकल आते हैं। उन्होंने हाल ही में एक बुजुर्ग को भी रोजगार दिया है।
रोज जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में खिलाती हैं खाना
सरिता रोज कूड़ा बीनने वाले (कबाड़ी), भिखारी या ठेला लगाने वाले करीब 10 से 35 बच्चों को मुफ्त खाना खिलाती हैं। ये बच्चे इस नेक काम के लिए सरिता को दुआएं दे रहे हैं। सरिता भले ही आर्थिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन इनका हौसला रानी की तरह मजबूत है। अब सरिता इस काम को बढ़ाने की सोच रही हैं। उनका कहना है कि वह एक डेढ़ महीने में एक और स्टॉल शुरू कर देंगी। सरिता के पास इतना पैसा नहीं है कि वह अकेली इतने बच्चों को खाना खिला सके, लेकिन फिर भी वह दिसंबर, 2019 से जरूरतमंदों की ’भूख’ से लड़ रही हैं। अब उनके पास जरूरतमंदों को खाना खिलाने के लिए पैसों की कमी नहीं होती। क्योंकि लोग उनको 10, 20, 50, 100 रुपये देकर चले जाते हैं। वह कहते हैं कि उनकी तरफ से भी बच्चों को एक प्लेट या दो प्लेट खाना खिला देना।
