कोरोना ने रोजगार भले ही छीन लिया हो, हौसला बरकरार है। इसे एक नए भारत निर्माण में फिर से उठ खड़े होकर दौड़ लगाने की छटपटाहट भी कह सकते हैं। सिर्फ और सिर्फ सरकार पर निर्भरता नहीं। रोजगार का इंतजार नहीं, बल्कि अपने हुनर से खुद ही काम की तलाश कर चार पैसे कमाने की ललक।
विभिन्न शहरों से वापस लौट रहे बिहार के हजारों युवा जिंदगी को फिर से रफ्तार देने में जुट गए हैं। हुनर पर भरोसा है, सो काम की तलाश में दीवारों पर अपना मोबाइल नंबर लिख रहे हैं। इसे नए भारत की वह तस्वीर कह सकते हैं, जिसमें आपदा के बीच अपने हुनर का विश्वास छिपा है। वह लडऩा और बढऩा जानता है।

खगडिय़ा के परबत्ता निवासी दिलखुश ने इलेक्ट्रॉनिक्स का कारोबार शुरू किया है। उन्होंने भी दीवार पर अपना मोबाइल नंबर छोड़ा है।
कोई मैकेनिक, कोई राजमिस्त्री
नोएडा के सेक्टर आठ में एक बाइक गैरेज में मैकेनिक का काम करने वाले बसैटी, अररिया के गुड्डू कुमार घर लौट आए हैं। यहां आते ही मैकेनिक का काम शुरू कर दिया। लोग बाइक ठीक कराने घर पर आ रहे हैं तो चार पैसे की कमाई हो जा रही है। यह चिंता नहीं है कि राशन-पानी का इंतजाम कैसे होगा। दिल्ली में ही मैकेनिक का काम करने वाले चिरैया (बांका) के गौतम कुमार ने भी घर में ही काम शुरू कर दिया है।
कोई प्लंबर का काम करने वाले, कोई राजमिस्त्री। बांका के ही राता के विमल कुमार शर्मा कोलकाता में फर्नीचर का काम करते थे। लॉकडाउन में रोजगार छिन गया तो घर लौटना पड़ा। दीवार पर नंबर चस्पा कर दिया है। वे कहते हैं, अब घर पर ही फर्नीचर बना रहे हैं। मेरठ में बिजली वायरिंग और पावरलूम चलाने वाले बौंसी के नूर मोहम्मद की भी यही कहानी है। रोजगार नहीं रहा तो लौट आए। अब यहीं काम की तलाश में हैं। उन्होंने भी अपना नंबर दीवार पर लिख दिया है।

बांका के राता निवासी विमल कुमार शर्मा कोलकाता में लौटने के बाद घर पर ही काम शुरू कर दिया है।
लौटने का सिलसिला जारी
प्रवासियों के लौटने का सिलसिला जारी है। पूर्व बिहार, सीमांचल और कोसी क्षेत्र के करीब तीन लाख प्रवासी वापस आ चुके हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो अपना हुनर बताते हुए दीवारों पर ही नंबर लिखकर प्रचार कर रहे हैं, ताकि जिन्हें जरूरत हो वे काम ले सकें। इनमें ज्यादातर बाइक मैकेनिक, मोटर मैकेनिक, रसोईया, गार्ड आदि का काम करते थे।
बिजली, भवन, मनरेगा में रोजगार की संभावनाएं
राज्य में बिजली के क्षेत्र में काफी काम हुए हैं। गांव-गांव तक बिजली पहुंचाई गई है। सो, इस क्षेत्र में मैकेनिक की मांग भी बढ़ गई है। बाहर से आने वाले सैकड़ों प्रवासी इसमें दक्ष हैं। ऐसे में उन्हें रोजगार की संभावना भी दिख रही है। वहीं, भवन निर्माण और मनरेगा में भी रोजगार की संभावना है। फिलहाल, सरकार सभी जिलों में प्रवासियों का स्किल सर्वे करा रही है।
असंगठित क्षेत्र में अवसर ज्यादा

विश्व के बाजार में बहुत बड़ा बदलाव आया है। अर्थव्यवस्था में श्रम बाजार का भी बड़ा योगदान है। इसमें श्रमिक जब तक अपनी योग्यता सिद्ध नहीं करेंगे, तब तक उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा। इसी कारण वे अपनी योग्यता का प्रचार-प्रसार अलग-अलग तरीकों से कर रहे हैं। रोजगार दो क्षेत्रों में मिलता है। एक संगठित और दूसरा असंगठित क्षेत्र। असंगठित क्षेत्र में रोजगार के ज्यादा अवसर हैं। लॉकडाउन के कारण असंगठित क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। यही कारण है कि श्रमिक स्वयं रोजगार का अवसर ढूंढ रहे हैं। किसी पर निर्भर नहीं है। यह अच्छे संकेत हैं। अब लकीर का फकीर बनने से काम नहीं चलेगा।
-डॉ. आरडी शर्मा, अर्थशास्त्री।
नई सुबह जरूर आएगी
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प्रवासी कामगार अपने हुनर के बारे में खुद लोगों को बता रहे हैं, यह अच्छी बात है। यह इस बात का भी संकेत है कि वे बिहार में ही रहना चाहते हैं। इससे यहां की अर्थव्यवस्था में भी सहयोग मिलेगा। सरकार उनके लिए रोजगार की व्यवस्था कर रही है, रोजगार दिए भी जा रहे हैं। वे अपना रजिस्ट्रेशन करा लें, सरकार ने उनके लिए विभिन्न क्षेत्रों में काम के अवसर देने की पहल की है। सब लोग मिलकर ही न सिर्फ इस आपदा से निपटेंगे, बल्कि एक नई सुबह भी आएगी।
श्याम रजक, उद्योग मंत्री, बिहार सरकार
