फरीदाबाद : गत 6 वर्षों के दौरान जैसे‘जैसे दशहरा पर्व नजदीक आता है वैसे वैसे ही एनआईटी फरीदाबाद में दशहरा मनाने वाली संस्थाओं में सरगर्मियां बढ़ जाती हैं। श्री सिद्ध पीठ हनुमान मंदिर नंबर-1 और फरीदाबाद धार्मिक एवं सामाजिक संगठन नामक दो संस्थाओं के बीच विगत 6 वर्षों से दशहरा पर्व मनाना मूंछ की लड़ाई साबित होता रहा है। राजनीतिक मंच पर भी इस लड़ाई को खूब भुनाया जाता रहा है। यहां तक कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को अपने प्रथम मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान सौहार्दपूर्ण वातावरण में दशहरा मनवाने हेतु स्वयं मंच पर आना पड़ा। यह वही मंच है, जिस पर केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर और हरियाणा में तत्कालीन उद्योग मंत्री रहे विपुल गोयल के बीच में अगले ही वर्ष खूब कहासुनी हुई थी। अब इस बार फिर अलग-अलग संगठनों के दावे प्रति दावे शुरू हो गए हैं।
सूत्रों की मानें, तो राजनीतिक दखल के चलते फरीदाबाद धार्मिक एवं सामाजिक संगठन को विगत वर्षों में दशहरा पर्व मनाने की इजाजत राजनैतिक एवं प्रशासनिक आशीर्वाद से ही प्राप्त होती रही है। पुरुषार्थियों के इस इलाके में दशहरा पर्व का अपना अलग ही महत्व है, क्योंकि विस्थापित हुए इन पुरुषार्थियों द्वारा दशहरा पर्व को एक अहम त्यौहार के रूप में हिंदुस्तान के विभाजन से पहले से ही मनाए जाने का चलन रहा है। बलूचिस्तान और फ्रंटियर में भी दशहरा बड़ी जोर-शोर से मनाया जाता रहा है। बुजुर्गों की मानें, तो श्री सिद्ध पीठ हनुमान मंदिर द्वारा पहले पाकिस्तान में और फिर गत 70 वर्षों से फरीदाबाद में दशहरा मनाया जाता रहा है, लेकिन विगत 6 वर्षों से राजनीतिक उठा-पटक और संस्थाओं के बीच में खींचा-तानी के चलते फरीदाबाद शहर का अहम त्यौहार वर्ष दर वर्ष फीका पड़ता जा रहा है।
फरीदाबाद शहर दशहरा पर्व पर सामाजिक और राजनीतिक रूप में दो धड़ों में बटा हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। पुरुषार्थियों की कौम के बुद्धिजीवियों द्वारा एक मायने में इस त्यौहार का बहिष्कार सा कर दिया दिखाई देता है। दशहरा पर्व पर जहां 6 वर्ष पूर्व तक पुरुषार्थियों के परिवारों के लोग न केवल दशहरा मैदान पर रावण के दर्शन हेतु अपितु खाने-पीने, झूले झूलने, आदि का आनंद उठाते दिखाई देते थे, वहीं आज इस तबके के लोग दिखाई तक नहीं देते।
इस वर्ष कोरोना के चलते ऐसा प्रतीत होने लगा था कि दशहरा पर्व मनाने की प्रशासनिक इजाजत शायद ही दी जाएगी, लेकिन इस बीच फरीदाबाद धार्मिक एवं सामाजिक संगठन द्वारा एक प्रेस नोट के माध्यम से यह जतलाने का प्रयास किया गया कि मानो दशहरा पर्व मनाने की उन्हें प्रशासनिक इजाजत मिल चुकी है। इस प्रेस नोट ने फरीदाबाद शहर के एनआईटी इलाके में एक बार फिर सरगर्मियां तेज कर दीं। श्री सिद्ध पीठ हनुमान मंदिर मार्केट नंबर 1 को अभी तक किसी प्रकार की प्रशासनिक इजाजत बारे में नहीं बताया गया है। इस प्रेस नोट को जाहिर करते हुए राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निर्मूलन परिषद के प्रदेश अध्यक्ष आनन्द कांत भाटिया ने मंगलवार को एसडीएम बड़खल पंकज सेतिया के कार्यालय पर करोना काल में जिन नियम व शर्तों के तहत दशहरा पर्व मनाने की प्रशासनिक इजाजत दी गई है, उसके बारे में जानकारी मांग ली है। भाटिया ने स्पष्ट तौर पर फरीदाबाद धार्मिक एवं सामाजिक संगठन नामक संस्था के गैर कानूनी रूप से मालवीय वाटिका, दशहरा मैदान पर काबिज होने की बात करते हुए न केवल संस्था अपितु प्रशासनिक अधिकारियों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
भाटिया की मानें, तो उन्होंने नगर निगम के एक दस्तावेज का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि नगर निगम ने इस संस्था से 25 जून, 2013 को दशहरा ग्राउंड की मालवीय वाटिका को बाकायदा सील करते हुए उसका कब्जा ले लिया था, जिसका जिक्र अपने लिखित बयानों में करते हुए नगर निगम फरीदाबाद ने माननीय न्यायालय को अवगत भी करवाया था।
आनन्द कान्त भाटिया ने मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार के साथ स्थानीय सांसदकृष्ण पाल गुर्जर, उपायुक्त फरीदाबाद, जिला उद्योग केंद्र को 9 अक्टूबर, 2020 को एक पत्र लिखते हुए नगर निगम अधिकारियों और संस्था के पदाधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अपने इस पत्र के माध्यम से भाटिया ने विजिलेंस विभाग से जांच की मांग करते हुए यह पूछा है कि किस आधार पर नगर निगम फरीदाबाद द्वारा कब्जे में ली गई जमीन पर संस्था के पदाधिकारी काबिज हो गए?
भाटिया द्वारा यह भी पूछा गया है कि क्यों प्रशासन को आज तक इस बात का ज्ञान नहीं हुआ कि संस्था गत कई वर्षों से बिना आय-व्यय का ब्यौरा दिए स्थानीय विधायकों एवं सांसदों के सरकारी निजी कोष से लाखों रुपए संस्था के नाम पर अथवा इस कब्जाई हुई जमीन पर निर्माण करने के लिए प्राप्त किए हैं?
आनन्द कान्त भाटिया प्रशासनिक अधिकारियों और संस्था के खिलाफ अनैतिक गतिविधियों की एक लंबी फेहरिस्त अपने पत्र के माध्यम से मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार तक पहुंचाने में कितने कामयाब होते हैं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तो तय है कि यदि प्रशासन ने किसी प्रकार के राजनीतिक अथवा सामाजिक दबाव के चलते दशहरा पर्व मनाने की इजाजत अबकी बार भी केवल फरीदाबाद धार्मिक एवं सामाजिक संगठन को दी, तो यकीनन भाटिया की इन दलीलों एवं प्रश्नों को दूसरी संस्थाएं अवश्य भुनाने का प्रयास करेंगी।

