रोहतक : जिला बार एसोसिएशन परिसर में सोमवार को महासचिव दीपक हुड्डा और पूर्व प्रधान लोकेंद्र फौगाट के नेतृत्व में सामूहिक उपवास रखा गया। इसमें काफी संख्या में अधिवक्ता शामिल हुए। कार्यक्रम में मुख्यातिथि पंजाब-हरियाणा बार काउंसिल के पूर्व चेयरमैन डा. विजेंद्र अहलावत रहे। अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर कहा कि तीन कृषि कानून ना केवल किसानों के हितों के खिलाफ है, बल्कि इन कानूनों से निम्न आय वर्ग तथा मध्यम आय वर्ग की जनता पर भी प्रभाव पड़ेगा। इन कानूनों के लागू होने के बाद महंगाई की मार और अधिक बढ़ जाएगी। सरकार को यह कानून वापस लेने चाहिए। अधिवक्ताओं ने कहा कि वह किसानों के साथ है और किसानों की हर संभव मदद की जाएगी। इस मौके पर पूर्व प्रधान दीपक कुंडू, पूर्व उप प्रधान अरविद श्योराण, पूर्व विधायक उमेद सिवाच, भगत सिंह मलिक, पूर्व प्रधान प्रदीप ब्राह्मण, पूर्व महासचिव जितेंद्र हुड्डा, आरएस मलिक, सतवीर नेहरा, नसीब डागर, चांद सिंह, जयपाल शर्मा, कृष्ण कौशिक और अजय दुआ आदि मौजूद रहे। सारे किसान संगठन तिरंगे के नीचे एकजुट होकर शांतिपूर्ण संघर्ष करें : दीपेंद्र हुड्डा

राज्यसभा सदस्य दीपेन्द्र हुड्डा ने देश के सभी किसानों और किसान संगठनों से अपील करते हुए कहा कि वे तिरंगे के नीचे एकजुट होकर कृषि कानूनों के खिलाफ संविधान के दायरे में शांतिपूर्ण संघर्ष करें। किसानों की मांगें जायज हैं हम उनका पूर्ण समर्थन करते हैं। वे सोमवार को रोहद टोल प्लाजा पर किसान धरने पर पहुंचे और आंदोलन को समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि बजट ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के सरकारी दावे की पोल खोल दी है। सरकार ने कृषि बजट में छह हजार करोड़ रुपये की कटौती करते हुए पिछले साल के 1.54 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 1.48 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। इस स्पीड से देश के किसान की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य कैसे हासिल होगा। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन को कुचलने व बदनाम करने के सारे सरकारी हथकंडे विफल हो चुके हैं। यह आंदोलन पहले से ज्यादा बड़ा और मजबूत हुआ है। सरकार आंदोलनकारियों की बिजली-पानी सप्लाई व इंटरनेट बंद करने की ओच्छी हरकत ना करे। प्रशासन आंदोलनकारियों को हर जरूरी मानवीय सुविधा मुहैया करवाए, ये उसकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि पिछली बार हुई आखिरी दौर की वार्ता की टेबल पर किसानों को बीच में ही छोड़कर सरकार भाग गई थी। किसान तो अपनी मांगों के समाधान की उम्मीद लगाए घंटों इंतजार करते रहे। इसलिए अब सरकार का दायित्व बनता है कि वो बातचीत की पहल करे और किसानों की मांगें माने।
