फरीदाबाद : सोशल मीडिया मानो व्यक्ति के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।बच्चे,युवा,किशोर हर कोई फेसबुक,व्हाट्सएप,इंस्टाग्राम,यु ट्यूब,टिक-टोक और ऐसे ही न जाने कितने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने आप को सक्रिय रखते है। कुछ सोशल मीडिया ऐप्प आज सामाजिक,राजनीति ओर शैक्षणिक क्षेत्रों में सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में उपयोगी भी रहे है वही कुछ ऐप्प ने समाज और युवाओं,किशोरों बच्चों पर दुष्प्रभाव भी डाले है।आज कुछ ऐप्प नशा का रूप लेकर उनके मन मष्तिक पर छा रहे है। सोशल मीडिया के अपने-अपने फायदे और नुकसान हैं लेकिन जब बच्चों के मन मष्तिस्क पर सर चढ़कर बोलने लगे तो एक बीमारी और समस्या का रूप ले लेती है विशेषकर भारतीय परिवेश में तो यह ओर भी गंभीर ओर चिंतनीय विषय है।
सोशल मीडिया ऐप्प टिक-टोक आज हमारे बच्चे और किशोरों के मन मष्तिक पर छाया हुआ है ।बच्चा टिक-टोक पर वीडियो बनाने में मशगूल है तो कोई टिक-टोक वीडियो देखने में खोया है । छोटे- छोटे बच्चों के हाथ से जब मोबाइल छीन लेते है तो रोने लगते है। इनसे अंदाज लगाया जा सकता है कि किस कदर टिक-टोक बच्चों पर प्रभाव डाल रहा है।आज यह एक बीमारी का रूप ले चुका है इस बीमारी से दुनिया में करीब एक अरब से ज्यादा और भारत मे करीब 25 करोड़ लोग ग्रसित है। मनोरंजन के नाम पर अवांछित सामग्री,द्विअर्थी शब्दावली का प्रयोग आदि सामग्री परोसी जाती है इसका प्रभाव बच्चों के मन,मस्तिष्क ओर विचारधारा पर पड़ना स्वाभाविक है।
यह मानसिक प्रदूषण से उन्हें दूषित करता है ओर अपनी पढ़ाई पर फोकस न कर जब टिक टोक में लगा रहेगा तो उसकी पढ़ाई भी प्रभावित होगी। दिलचस्प बात यह है कि आज टिक टोक का इस्तेमाल करने वालो में गांवों और छोटे शहरों में लगातार बढ़ रही है और इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह भी है कि इसके इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति और 10 से 20 वर्ष के बच्चों व किशोरों पर सर चढ़कर बोल रहा है इसकी दीवानगी छा रही है।ऐसे में टिक टॉक जैसे ऐप्प पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग उठती रही है। देश की सामाजिक संस्थाओं,स्वयंसेवक संघ की आर्थिक और स्वदेशी जागरण मंच के द्वारा भी इसे प्रतिबंधित करने के लिए देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की थी। पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने भी टिक टॉक जैसे ऐप्प पर प्रतिबंध लगाए जाने का आदेश सरकार को दिया है।आज एक बार फिर सोशल मीडिया पर टिक टॉक जैसे ऐप्प को प्रतिबंधित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे एप्स जो भारतीय बच्चों के मन मस्तिष्क को प्रभावित कर हमारी संस्कृति और हमारे सामाजिक परिवेश को दूषित करता हो उसको लेकर सरकार गंभीर क्यों नहीं होती। जब जनता कोई आवाज उठाये या न्यायालय को आदेश देने पर ही सरकार की नींद खुलती है।
आज आवश्यकता है एक कठोर गाइडलाइन बनाये जाने की ताकि ऐसे एप्स हमारे समाज ओर किशोर,बच्चों के मन मस्तिष्क पर घुसपैठ न कर सके।अभिभावकों का भी दायित्व बनता है कि अगर हमें बच्चों को अवांछित सामग्री और गतिविधियों से दूर रखना है उनके मन मष्तिक को दूषित होने से बचाना है उनका ध्यान भविष्य निर्माण में लगाना है तो हमें उन पर नजर रखनी होगी। हमे ऐसे ऐप्प से अपने बच्चों को दूर रखना होगा,उन्हें समझाना जागरूक करना होगा।
