अखिल भारतीय संत एकता आंदोलन परिषद एवं गुरु गोरक्षनाथ मानव कल्याण संस्थान कपूरथला पंजाब के परमाध्यक्ष महंत कैलाश नाथ हठयोगी ने एक बयान जारी कर कहा कि शिव अवतार भगवान गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज जी जैसे समस्त अवतार महापुरुष साधु संत साधक धर्माचार्य पंच तत्वों के संरक्षक संवर्धन पर्याय है ना की किसी जाति क्षेत्र भाषा गांव घर संकीर्ण विचारधारा रखने वाले लोगों के अतएव किसी सिद्ध साधक अवतार ऋषि मुनि साधु-संतों धर्माचार्य को जाति धर्म वर्ग विशेष के साथ जोड़कर देखना न्यायोचित नहीं है समाज और संत धर्माचार्य कहते हैं
” जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान”
शिव अवतार भगवान गुरु गोरक्षनाथ जी एवं उनके सद् ग्रह अस्त गुरु माया दादा गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी महाराज हठयोग तंत्र विद्या श्री विद्या के महान साधक थे कारण अनेक राजाओं ने उनसे योग की दीक्षा ली जिनमें शेर गणपति मांधाता उज्जैनी के महाराज भरतरी हरी उनके सगे भांजे गोपीचंद भक्त पूरणमल सियालकोट पाकिस्तान बप्पा रावल महारानी मैनावती कर्मावती आल्हा उदल जाहर गोगा पीर इत्यादि नेपाल के प्रथम शासक महाराजा बीर बिक्रम शाह देव आदि राजाओं ने भगवान गुरु गोरक्षनाथ मत्स्येंद्रनाथ से दीक्षा लेकर नाथ परंपरा में सम्मिलित हुए नाथ पंथ की स्थापना योगसाधना मानव सेवा पंचतत्व की रक्षा प्रकृति की रक्षा मानवता की रक्षा सर्वधर्म सद्भाव की भावना के साथ लोक कल्याण के लिए कार्य करना ही नाथ पंथ परंपरा का मूलभूत उद्देश्य रहा है वैसे भी योग का अभिप्राय जोड़ना है ना कि तोड़ना किंतु वर्तमान समय में देश काल परिस्थिति कुछ लोगों के स्वभाव अवश्य परिवर्तन आया है जिससे नाक परंपरा के गौरवपूर्ण अतीत कालीन इतिहास को नष्ट कर हम ब्रह्मास्मि के सूत्र को अंगीकार करने में लगे हैं जिसे समाज एवं मान्यताएं स्वीकार नहीं करती हैं कारण भगवान गुरु गोरक्षनाथ जी का संपूर्ण जीवन तप त्याग वैराग्य साधना करुणा सेवा भाव था ना कि निहित स्वार्थ था उनके महान आदर्शों साधना का प्रभाव जैन बौद्ध ईसाई सिख यहूदी पारसी सभी धर्मों संतों पर अधिक या आंशिक रूप से पड़ा है
इसलिए संत सबका होता है उसकी साधना सोच विचार धारा जो सामाजिक संकीर्ण स्वार्थ युक्त बंधन युक्त दीवारें हैं अर्थात अंधकार के जो पर्दा हैं उन्हें नष्ट कर साधना के माध्यम से सेवा भाव के द्वारा संकीर्ण विचारों को त्याग कर विश्व बंधुत्व पंचतत्व के रक्षार्थ समर्पित संकल्पित भाव से कार्य करता है साधु संत साधक पीर फकीर धर्माचार्य के जीवन में अलगाववाद जातिवाद क्षेत्रवाद भाषावाद नहीं होता है इस प्रकार के संकीर्ण सोच विचारधारा रखने वालों का हम और आप समाज मान्यताएं परंपराएं साधु संत पीर फकीर धर्माचार्य के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं साधन संपन्न होना भौतिक संसाधनों का असीमित भंडार होना अलग बात है उसे सांसारिक लोग अवश्य महत्व देंगे किंतु जिसे लोग अध्यात्मिक साधक के रूप में जानते हैं तथा स्वीकारते हैं वह भला क्यों महत्व देंगे यदि भौतिक साधन संसाधन धन कोही साधना का स्थान दिया गया होता तो भगवान गुरु गोरक्षनाथ जी के पास ऐसा कुछ नहीं था मात्र साधना सोच विचार धारा थी जिसके कारण अनेक राजाओं ने अपने भौतिक सुखों का परित्याग कर धन महल दौलत को तिलांजलि देकर उनके शिष्य बने संभवत उनके सम कालीन राजाओं साधन संपन्न लोगों को कोई जानता भी नहीं है किंतु हमारी सनातन संस्कृति में तप त्याग साधना करुणा सेवा भाव की भावना मानवता की भावना एवं रक्षार्थ का स्थान सर्वोपरि है
अन्यथा संसार अरब के शेखों अमेरिका जैसे धनाढ्य देशों को ही साधु संत के रूप में अपना आदर्श मानते किंतु हमारा देश की संस्कृति मान्यताओं में साधु-संतों साधकों पीरों फकीरों का महत्वपूर्ण स्थान है जिसका मूल कारण है उनका तप त्याग करुणा मैत्री सेवा भाव मानवता की रक्षा शांति सद्भावना की प्रकृति एवं पंच तत्वों की रक्षा करना परमेश्वर की बनाई संस्कृति सृष्टि की रक्षा करना भेदभाव पूर्ण हिंसा नफरत को मूल जड़ से नष्ट करना आदि सोच विचार रखने वाले को हम साधु संत धर्माचार्य अवतार कहेंगे या किसी और को यह विचार कर सकते हैं
प्राचीन भारत में लोग सद्गुणों के पास दर्शनार्थ मार्गदर्शन के लिए जाते थे किंतु अब प्रदर्शन करने के लिए जाते हैं पहले सन्यास दीक्षा तब त्याग साधना सेवाभाव धर्म पथ पर चलने के लिए लेते थे किंतु अब संन्यास लेते हैं भव्य आश्रम मठ मंदिर आश्रम मार्ग के निर्माण भौतिक संसाधनों के संग्रह करने के लिए एवं सताए को ज्ञान वैराग्य सिद्ध साधक का पर्याय बन कर देश समाज को चलने के लिए प्रयत्न करते हैं जो सर्वत्र दिख रहा है यह एक नई परिपाटी का उद्गम है पहले भौतिक सुखों संसाधनों महल भव्य भवनों का त्याग पर्ण कुटीर वृक्षों के नीचे धोने रमा कर एकांत में लोक कल्याण के लिए साधना करते थे किंतु आज संन्यास लेने के तत्काल बाद ही भव्य मठ मंदिरों आश्रमों का निर्माण करना भौतिक संसाधनों का भंडार खड़ा करना तप त्याग साधना सेवा भाव से मिलो दूर रहना आज की विशेषताएं हैं
जो सर्वत्र देखने सुनने अनुभव करने को मिल रहा है जिस कारण से साधु संतों की सनातन मान मर्यादा प्रभावित हुई है पहले साधु-संत सिद्ध छपते थे अब छपते हैं यह समय का प्रभाव नहीं है बल्कि सोच और संस्कारों विचारों का प्रभाव है जो सोचनीय है महर्षि वाल्मीकि गुरु गोरक्षनाथ जी मत्स्येंद्रनाथ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य संत कबीर रविदास रैदास तुकाराम ज्ञानदेव नामदेव गुरु नानक देव जी ज्ञान वैराग्य के प्रतिमूर्ति स्वामी महावीर एवं सिद्धार्थ गौतम बुद्ध आदि चक्रवर्ती राजाओं ने अपना सर्वस्व त्याग कर साधना के पथ पर चलकर साधकों के परम पद पर सुशोभित हुए संतो ने अपने तप त्याग सेवाभाव करना मानवीय मूल्यों सकारात्मक सोच विचार धारा चिंतन के कारण आज भी वंदनीय एवं प्रेरणा के स्रोत है जिन्हें देश समाज विदेश का हर वर्ग श्रद्धा सम्मान के साथ सादर स्मरण करता है इनके पास बड़े-बड़े मठ कुबेर का खजाना नहीं था और ना ही यह लोग भेदभाव संकरण विचार व्यवहार किसी के साथ करते थे
इसी कारण संपूर्ण सनातन संसार इन्हें सम्मान पूर्वक स्मरण करता है जिन्हें हम हम साधु संत पीर फकीर धर्म उपदेशक साधक सिद्ध कह सकते हैं जिन्होंने समाज को कुशल नेतृत्व दिया है उनके विचार संस्कार सिद्धांत जब तक पंच तत्वों की सृष्टि पृथ्वी पर रहेगी तब तक उन लोगों की पवित्र स्मृतियां भी रहेंगी अतः साधु संत साधक पीर फकीर सन्यासी को भौतिकवादी महत्वकांक्षी राजनैतिक पद प्रतिष्ठा के चक्कर में अपनी मान मर्यादा को कभी भी नहीं भूलना चाहिए घर परिवार मां पिता परिवार त्याग कर भी संयास लेने के बाद भी मोह माया धन उपार्जन भौतिक सुखों ईट पत्थर के बने मठ मंदिरों के साथ अधिक लगाव होने का अभिप्राय है कि “आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास” की कहावत आजकल के स्वयंभू संतो के सामने उदाहरण के रूप में देखने को मिल रहा है
