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Home » भगत सिंह की फांसी के बाद का पूरा सच? आखिर क्या था

भगत सिंह की फांसी के बाद का पूरा सच? आखिर क्या था

faridabadnews24By faridabadnews24September 27, 2021Updated:September 27, 2021No Comments5 Mins Read
Image Source : Google

साल के नौवें महीने का यह 27वां दिन इतिहास में भारत माता के सबसे लाडले पुत्र और उसे अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए 23 बरस की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे पर झूल गए अमर शहीद भगत सिंह के जन्मदिन के तौर पर दर्ज है। अविभाजित पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान में) में 27 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह बहुत छोटी उम्र से ही आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए और उनकी लोकप्रियता से भयभीत ब्रिटिश हुक्मरान ने 23 मार्च 1931 को 23 बरस के भगत को फांसी पर लटका दिया।  मौत का सच जानने के लिए लोग यहां-वहां भाग रहे थे और अखबार तलाश रहे थे। उस सुबह जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पढ़ी कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम 7:33 पर फांसी दे दी गई। वह सोमवार का दिन था। ऐसा कहा जाता है कि उस शाम जेल में पंद्रह मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे।

एक दिन पहले ही दे दी फांसी
केंद्रीय असेम्बली में बम फेंकने के जिस मामले में भगत सिंह को फांसी की सजा हुई थी उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई थी। लेकिन उस समय के पूरे भारत में इस फांसी को लेकर जिस तरह से प्रदर्शन और विरोध जारी था उससे सरकार डरी हुई थी और उसी का नतीजा रहा कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुपचाप तरीके से तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई।

क्या थे भगत सिंह के आखिरी शब्द
फांसी के समय जो कुछ आधिकारिक लोग शामिल थे उनमें यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी शामिल थे। जितेंदर सान्याल की लिखी किताब भगत सिंह के अनुसार ठीक फांसी पर चढऩे के पहले के वक्त भगत सिंह ने उनसे कहा, मिस्टर मजिस्ट्रेट आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के कांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं।

इस वजह से हुई थी फांसी
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद सेंट्रल एसेंबली में बम फेंक दिया। बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं, जिसके नतीजतन उन्हें फांसी की सजा हुई थी। तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर ही फांसी दे दी गई थी। जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे, उन्होंने कई किताबें पढ़ीं थी। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह और उनके दोनों साथी सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।

आखिर क्या हुआ 23 मार्च के दिन
जिस वक्त भगत सिंह जेल में थे उन्होंने कई किताबें पढ़ीं। 23 मार्च 1931 को शाम करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी ही पढ़ रहे थे। जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनकी फांसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – ठीक है अब चलो।

फांसी पर जाते समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू तीनों मस्ती से गा रहे थे –
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रंग दे बसन्ती चोला। माय रंग दे बसन्ती चोला।।
फांसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहां मिट्टी का तेल डालकर इनको जलाया जाने लगा। गांव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गांव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।

छिड़ा मृत्यु पर विवाद
हालांकि अभी तक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी विवादित है। इस बारे में हर जगह एक सी जानकारियां नहीं मिलतीं। लेकिन कई किताबों और फिल्मों में यह जानकारी साफ तरह से है कि 23 तारीख को आखिर क्या हुआ था। 2002 में राजकुमार संतोषी की डायरेक्ट की गई फिल्म द लीजेंड ऑफ सिंह में भी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फांसी के बारे में यह हिस्सा दिखाया गया है। फिल्म में यह दिखाया गया है कि भगत सिंह के परिवार और बाकी लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल जाती है कि तीनों क्रांतिकारियों को सजा की तय तारीख से एक दिन पहले ही फांसी दी जा रही है। फिल्म के दृष्य के अनुसार परिवार और बाकी लोग जेल के बाहर प्रदर्शन कर रहे होते हैं और अंदर उन्हें फांसी दे दी जाती है। जब लोग जेल के अंदर घुसने की कोशिश करते हैं तो उन तीनों की लाश को दूसरे गेट से बोरे में भरकर बाहर निकाला जाता है। लेकिन प्रदर्शनकारी उन तक पहुंच जाते हैं। फिल्म में इस दृश्य के अंत में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह ब्रिटिश पुलिस उन तीनों की लाश के टुकड़े कर उन्हें जला देती है।

News Source : punjabkesari

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