
Chunaavee Kissa: जिस तरह आज भारतीय जनता पार्टी (BJP) का टिकट जीत की गारंटी है, वैसे ही आज से 76 साल पहले कांग्रेस (Congress) पार्टी लगभग अपराजेय थी. देश में पहले लोकसभा चुनाव (Loksabha Election) 1952 में संपन्न हुए थे और जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) जननायक थे. उस समय देश में जवाहर लाल नेहरू की लहर थी. उस चुनाव में जिसे कांग्रेस पार्टी से टिकट मिल गया उसकी नैया पार हो गई. इस चुनाव में संविधान निर्माताओं में से एक डॉ. भीमराव अंबेडकर (Dr BR Ambedkar) भी खड़े हुए थे. पहले लोकसभा चुनाव में तब अंबेडकर शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन पार्टी से लड़े थे. लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.
कांग्रेस ने फहराया था जीत का परचम
पहले आम चुनाव के लिए मतदान का काम फरवरी 1952 के आखिरी सप्ताह में खत्म हो गया. जब मतगणना हुई तो कांग्रेस आसानी से जीत गई. कांग्रेस पार्टी को संसद में 489 में से 364 सीटों पर और पूरे देश में 3280 विधानसभा सीटों में से 2247 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. पूरे संसदीय चुनाव में कांग्रेस को कुल मतदाताओं का 45 फीसदी वोट हासिल हुआ था और इसने 74.4 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि राज्य विधानसभाओं के लिए हुए चुनाव में इसे कुल मतों का 42.4 फीसदी हासिल हुआ था. इसने 68.6 फीसदी सीटों पर कब्जा जमाया था. लेकिन इस माहौल में भी कांग्रेस के 28 मंत्री चुनाव में हार गए थे.
काजरोलकर से हार गए अंबेडकर
लेकिन इस चुनाव में सबसे हैरानी वाला परिणाम डॉ. भीमराव अंबेडकर की हार रही थी. उनकी पहचान देश भर में अनुसूचित जातियों के कद्दावर नेता के तौर पर थी. लेकिन बंबई में उनके निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने तब अंबेडकर के सामने उनके पीए नारायण एस काजरोलकर को खड़ा किया था. वह भी बैकवर्ड क्लास से थे. इसके अलावा कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा से भी एक-एक प्रत्याशी था. नारायण काजरोलकर दूध का कारोबार करने वाले एक नौसिखिए नेता थे. लेकिन नेहरू की लहर इतनी तगड़ी थी कि नारायण काजरोलकर 15 हजार वोटों से जीते थे. अंबेडकर चौथे स्थान पर रहे थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब ‘भारत: गांधी के बाद’ के अनुसार मशहूर मराठी पत्रकार पी. के. अत्रे ने एक नारा गढ़ा था जो उस वक्त काफी मशहूर हुआ था…
कुथे तो घटनाकर अंबेडकर
आनी कुथे हा लोनिविक्या काजरोलकर
(इसका मतलब था:कहां संविधान के महान निर्माता अंबेडकर और कहां नौसिखिया दूध बेचने वाला काजरोलकर?)
हिंदू महासभा ने क्या कहा?
लेकिन आखिर में कांग्रेस की पकड़ और प्रतिष्ठा काजरोलकर के पक्ष में काम कर गई. इसके अलावा नेहरू ने जो बंबई में जो भाषण दिए थे वो भी काजरोलकर के पक्ष में रहे. अंबेडकर आजादी के आंदोलन में सबसे प्रमुख शख्सियतों में से थे. देश में उनके जैसा पढ़ा-लिखा उस समय शायद ही कोई था. इकोनॉमिक्स से दो डॉक्टरेट की डिग्रियां। एक अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से, दूसरी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से. अंबेडकर की योग्यता को देखते हुए उन्हें संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का चेयरमैन बनाया गया था. हिंदू महासभा (अब बीजेपी) का दावा है कि नेहरू ने अंबेडकर को राजनीति की मुख्य धारा में नहीं आने दिया. उनकी हार सुनिश्चित करने के लिए खुद नेहरू ने चुनाव प्रचार भी किया. 1954 में भी नेहरू ने ही दूसरी बार पक्का किया कि वह भंडारा से उपचुनाव में न जीतने पाएं. डॉ. अंबेडकर का 1956 में निधन हो गया था.
सबसे बड़ी जीत रही कम्युनिस्ट नेता की
लेकिन उस चुनाव में एक और चौंकाने वाली बात यह थी कि कम्युनिस्ट नेता रवि नारायण रेड्डी जिन्होंने चुनावों में व्हिस्की का पहला जाम पिया था उन्होंने सबसे बड़ी जीत हासिल की थी. उनकी जीत का अंतर जवाहर लाल नेहरू की जीत के अंतर से भी ज्यादा था l
NEWS SOURCE : news18
