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Home » आज भी बोझ ही हैं! हमारे समाज में बेटियां

आज भी बोझ ही हैं! हमारे समाज में बेटियां

faridabadnews24By faridabadnews24March 28, 2024No Comments6 Mins Read
IMAGES SOURCE : GOOGLE

Bhopal: बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… म्हारी छोरियां, छोरों से कम हैं क्या ? आज भी हमारे समाज में ये सब सिर्फ कहने की बातें हैं. इन विचारों से हकीकत का कोई लेना-देना नहीं है. बस इन नारों के जरिये देश में बेटियों की दशा और समाज की सोच को छिपाने की कोशिश होती है. आज भी हमारे समाज में लड़की का मतलब परिवार पर बोझ ही माना जाता है. समाज की इसी सोच का शिकार हुईं हैं भोपाल की रहने वाली दो मासूम बेटियां. जिन्हें उनकी मां ने ही फांसी पर लटकाकर मार डाला. तीसरी बच्ची को भी फंदे पर लटकाया गया था. लेकिन वो बच गई. इसके बाद मां ने भी अपनी जान ले ली.

बेटा ना होने की वजह से..

ये घटना भोपाल के गुनगा की है. जहां 28 वर्षीय संगीता यादव ने वर्ष 2018 में रजत यादव से शादी हुई थी. उनकी तीन बेटियां.. 5 साल की आराध्या, 3 साल की मान्या और डेढ़ साल की कीर्ति थी. संगीता को बेटा ना होने की वजह से पति और ससुराल वाले प्रताड़ित करते थे. पुलिस को जो सुसाइड नोट मिला है, उसमें संगीता ने अपनी मजबूरी भी लिखी है. संगीता ने लिखा है कि पेट में बीमारी की वजह से वो अब बच्चे पैदा नहीं कर सकती, इसलिए ऐसा करने जा रही है.

पति बेटा नहीं होने के कारण मारपीट करता है..

खुदकुशी करने से पहले संगीता ने रात को अपनी ननद मोना और भाई नीरज को 5 Voice Message भेजे थे. जिसमें कहा था कि पति बेटा नहीं होने के कारण मारपीट करता है. पति ने कहा था कि उन्हें बेटियों से कोई मतलब नहीं. इसलिए उसने बेटियों को मार डाला. Audio Messages में संगीता ने खुदकुशी करने से पहले जो बातें कहीं थीं.. उसे सुनने के बाद… आपको भी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे बेमानी लगने लगेंगे.

ये घटना हमारे समाज का आईना

सोचिये तीन बच्चियों की मां..संगीता..बेटा ना होने की वजह से कितने प्रेशर में रही होगी कि उसने अपनी बच्चियों की अपने ही हाथों से जान ले ली. ये कोई मामूली घटना नहीं है. ये घटना हमारे समाज का आईना है जिसकी जुबान पर तो बेटियों के लिए शाबासी होती है लेकिन मन ही मन ये समाज आज भी बेटियों को बोझ समझता है . कड़वा है मगर सच यही है. लड़का ही वंश चलाएगा…ये मानसिकता आज भी समाज में फैली हुई है. सिर्फ अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे परिवारों में ही नहीं बल्कि शिक्षित लोगों में आज भी ये मानसिकता खत्म नहीं हुई है.

आज भी बेटों के सामने बेटियों को दूसरे दर्जे का स्थान

भारतीय समाज का सबसे गहन अध्ययन करने वाले National Family Health Survey में भी इसका पता चलता है. करीब 80 प्रतिशत भारतीय परिवार अभी भी कम से कम एक बेटे की चाहत रखते हैं. 15 प्रतिशत भारतीय परिवार बेटियों से ज्यादा बेटों को तरजीह देते हैं. यानी आजादी के 75 वर्ष बाद भले ही देश की बेटियां अंतरिक्ष तक उड़ान भर चुकी हों और फाइटर जेट्स उड़ा रही हों लेकिन समाज में आज भी बेटों के सामने बेटियों को दूसरे दर्जे का स्थान मिला हुआ है. विकसित भारत..आत्मनिर्भर भारत के दौर में बेटों के प्रति समाज की दकियानूसी सोच आज भी जड़ें मजबूत किये हुए हैं.

बेटियों के प्रति समाज की बीमार सोच

परिवार के नाम को तो बेटा ही आगे बढ़ाएगा. बुढ़ापे में बेटा ही मां-बाप की सेवा करेगा. बेटियां तो पराया धन होती हैं. बेटियों को ब्याहने के लिए दहेज देना पड़ेगा. यही सोच सदियों से भारतीय समाज की पहचान रही है और आज भी है. जिसकी वजह से भोपाल में एक मां को अपनी बेटियों की हत्या करने का फैसला लेना पड़ा. ये बेटियों के प्रति समाज की बीमार सोच का ही नतीजा है. जिसका इलाज सिर्फ नारे लगाने या बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं होने वाला.

भारतीय समाज में लड़कियों को बोझ मानने की परंपरा

भारतीय समाज में लड़कियों को बोझ मानने की परंपरा तो हमेशा से चली आ रही है. लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि वक्त बदल रहा है, और अब समाज में बेटियों को उनका उचित स्थान मिल रहा है, तो ऐसा भी नहीं है. क्योंकि आज भी कन्या भ्रूण हत्या..भारतीय समाज की वो हकीकत है. जिसे कोई मानने के लिए तैयार नहीं है लेकिन मुंह फेर लेने से सच्चाई नहीं बदल जाती. सच्चाई ये है कि कन्या भ्रूण हत्याएं हो रही हैं.

भारत में हर वर्ष 5 लाख 19 हजार बच्चियां जन्म नहीं ले पाएंगी

सऊदी अरब की किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कुछ वक्त पहले एक रिपोर्ट छपी थी. जिसमें कहा गया था कि 2017 से 2025 के बीच हर साल 4 लाख 69 हजार बच्चियों की गर्भ में हत्या की आशंका है. वर्ष 2026 से 2030 के बीच भारत में हर वर्ष 5 लाख 19 हजार बच्चियां जन्म नहीं ले पाएंगी. द लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्ष 2007 से 2016 के दौरान 55 लाख बेटियों को गर्भ में मार दिया गया. United Nations Population Fund की 2020 में आई रिपोर्ट के मुताबिक कन्या भ्रूण हत्या की वजह से भारत की आबादी में 4 करोड़ 60 लाख महिलाएं कम हैं.

ये आंकड़े शर्मिंदा करने वाले हैं

ये आंकड़े अविश्वसनीय हैं और शर्मिंदा करने वाले भी हैं. ये सही है कि कन्या भ्रूण हत्या का खामियाजा सबसे ज्यादा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है. लेकिन बेटे की चाहत में बेटियों को नजरअंदाज करने का नतीजा समाज को भी भुगतना पड़ेगा. एक लाइन आपने जरूर सुनी होगी. बेटी नहीं बचाओगे, तो बहू कहां से लाओगे. ये सवाल सुनने में थोड़ा मजाकिया लग सकता है लेकिन ये बहुत गंभीर बात है. क्योंकि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के बाद भी भारत में हजार लड़कों पर सिर्फ 940 लड़कियां हैं.

भारत में हर दसवें लड़के लिए दुल्हन नहीं है

वर्ष 2020 में आई World Economic Forum की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दसवें लड़के लिए दुल्हन नहीं है. वर्ष 2050 तक भारत में दो करोड़ तीस लाख ऐसे लड़के होंगे, जिन्हें बिना किसी जीवनसाथी के अकेले जिंदगी बितानी पड़ेगी. हमारे देश में भ्रूण हत्या को रोकने के लिए कानून है. जिसके तहत कोई भी गर्भ में पल रहे बच्चे का Gender Test नहीं करवा सकता. लेकिन फिर भी ऐसा हो रहा है. गर्भ में ही बच्चियों को मारा जा रहा है. सिर्फ कानून बना देने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा. और ये तबतक होता रहेगा जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलेगी. वरना ऐसे ही बच्चों को कभी कोख में तो कभी जन्म लेने के बाद मारा जाता रहेगा

NEWS SOURCE : zeenews

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