
बहादुरगढ़ : प्रदेश के अंदर सरकार के तमाम कार्यक्रमों का आंदोलनकारियों द्वारा विराेध किए जाने के बीच अब एक नई सुगबुगाहट आंदोलन के बीच ही सुनी जा रही है। पिछले दिनों हिसार में जो घटना हुई, उसके बाद से कई खाप नेता और धरनों पर डटे आंदोलनकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ऐसे किसी भी विरोध के समय संयुक्त मोर्चे के नेता अगुवाई क्यों नहीं करते।केवल धरनों पर डटे आम किसानों को ही विरोध की जिम्मेदारी क्यों दे दी जाती है और जब हिंसक टकराव हो जाता है तो बाद में संयुक्त मोर्चे के नेता पहुंचते हैं। इसी मसले पर एक दिन पहले टीकरी बॉर्डर पर डेरा डाले बैठे सिरसा के किसान नेता एवं स्वामीनाथन संघर्ष समिति के अध्यक्ष विकल पचार ने भी फेसबुक पर लाइव आकर तर्क दिया था। उनका कहना था कि जब भी भाजपा और जजपा के विरोध की कोई गतिविधि होती है तो वहां पर संयुक्त मोर्चा का कोई नेता नहीं पहुंचता। जबकि कोई भी महापंचायत होती है तो वहां पर संयुक्त मोर्चा के अधिकतर नेता पहुंच जाते हैं। यह एक तरह से हमारे नेताओं की कमी है। प्रदेश में काफी किसानों को विरोध के समय चोट लग चुकी है।
50 हजार किसानों पर मामले दर्ज हो चुके हैं। इसलिए आगे से जब भी सत्ता पक्ष के किसी कार्यक्रम के विरोध की आवाज उठेगी तो संयुक्त मोर्चे के नेताओं को जरूर पहुंचना होगा। उधर, गठवाला खाप के महासचिव अशोक मलिक मदीना का कहना है कि संयुक्त मोर्चा ने ही भाजपा व जजपा के विरोध का आह्वान कर रखा है। इसी पर प्रदेश के किसान सीएम, डिप्टी सीएम और मंत्रियों के कार्यक्रमों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश से जड़े संयुक्त मोर्चा के नेता वहां पर नहीं पहुंचते।जब किसानों और पुलिस में टकराव हो जाता है और स्थिति हिंसक हो जाती है तब मोर्चा के नेता अपनी नेतागिरी के लिए पहुंचते हैं। जब तक संयुक्त मोर्चा का कोई नेता विरोध के लिए नहीं पहुंचता तब तक किसानों को भी किसी तरह के टकराव से बचना चाहिए। केवल अपने स्तर पर इस तरह के विरोध से बाद में कानूनी कार्रवाई झेलनी पड़ेगी। जहां तक सरकार का सवाल है तो उसे भी कोरोना संकट के बीच सार्वजनिक कार्यक्रम से बचना चाहिए।
