नई दिल्ली : कोरोना वायरस के नए वेरियेंट ओमीक्रोन का खौफ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर पाबंदी और यात्रा प्रतिबंधों के जरिए इस वेरियेंट को फैलने से रोकने के प्रयास हो रहे हैं। फिर भी उन देशों की लिस्ट बढ़ती जा रही है जहां ओमीक्रोन से संक्रमित मरीज मिले हैं। ऐसे में सरकारें फिर से लॉकडाउन लगाने लगे तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। भारत ने कोरोना की पहली लहर में ही मार्च 2020 में दुनिया का सबसे कठोर लॉकडाउन लगाया था। तो क्या ओमीक्रोन को रोकने के लिए भी भारत में लॉकडाउन का ऐलान हो सकता है?
फिर से लॉकडाउन का फैसला बहुत गलत होगा: अंकलेश्वर अय्यर
आर्थिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ स्तंभकार स्वामी अंकलेश्वर अय्यर ने हमारे सहयोगी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स (ET) के लिए लिखे अपने ताजा लेख में कहा है कि भारत सरकार ने अगर फिर से लॉकडाउन लगाया तो यह उसका बहुत गलत फैसला होगा। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत के कार्यकारी निदेशक सुरजीत भल्ला के हवाले से कहा कि लॉकडाउन के नकारात्मक परिणाम ज्यादा देखे गए बजाय सकारात्मक नतीजों के। अगर फिर से लॉकडाउन लगाया गया तो देश में गरीबी बढ़ सकती है।
प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री का सवाल
स्वामी अंकलेश्वर का कहना है कि कोरोना वायरस बहुत घातक है, इसमें कोई शक नहीं क्योंकि कोविड-19 महामारी में दुनियाभर से लाखों लोगों की मौत हुई। लेकिन, सारी मौतें बीमारी के कारण ही नहीं हुईं बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के चरमरा जाने के कारण भी बड़ी संख्या में मरीजों को इलाज नहीं मिल सका और उन्होंने दम तोड़ दिए। वहीं, सबसे ज्यादा मौतें 70 वर्ष से ज्यादा की उम्र के लोगों की हुई है। स्टैंडफर्ड के जॉन आयोनिडिस (John Ioannidis) ने वैश्विक आंकड़ों का आकलन के आधार पर कहा कि 70 वर्ष से कम उम्र के कोविड मरीजों की मौतों की दर महज 0.05% है। स्पष्ट है कि कोरोना वायरस बुजुर्गों और गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए जानलेवा बनता है। यानी, यह दुनियाभर की संपूर्ण आबादी की समस्या नहीं है। वो पूछते हैं, ‘तो फिर बुजुर्गों और बीमारों की मौतों को रोकने के लिए पूरी अर्थव्यवस्था का पहिया रोकने का क्या मतलब है?’
सिर्फ मौत ही त्रासदी नहीं होती…
देश के इस प्रतिष्ठित स्तंभकार का कहना है कि 16 वर्ष से कम उम्र के कोविड मरीजों में बहुत कम की मौत हुई, फिर भी स्कूल बंद कर दिए गए। इस दौरान अमीरों ने तो अपने बच्चों को ऑनलाइन ट्यूशन की सुविधा दिलवा दी, लेकिन गांवों में गरीब माता-पिता के बच्चे 500 दिन से भी ज्यादा दिन तक शिक्षा से वंचित रह गए। उनमें कई अशिक्षित रह जाएंगे। उन्होंने विभिन्न स्टडी डेटा के हवाले से कहा है कि भारत में संभवतः 20 करोड़ लोग लॉकडाउन की वजह से गरीबी की चपेट में चले गए हैं। मृत्यु अगर त्रासदी है तो बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, छोटे-छोटे व्यवसायों की बर्बादी, शिक्षा क्षेत्री की तबाही और जीडीपी में 8.5% की ऐतिहासिक गिरावट भी त्रासदी ही है।
Omicron News Today: वैक्सीन को भेद देता है ओमीक्रोन तो क्या इलाज भी नहीं हो पाएगा? जानें बड़े सवालों के जवाब
मॉडर्ना के सीईओ स्टीफन बैंसेल ने ओमीक्रोन वेरियेंट को लेकर बड़े खतरे का अंदेशा जताया है। उन्होंने कहा कि इस वेरियेंट के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि ओमीक्रोन को लेकर मिल रही वैज्ञानिक जानकारियां चिंता बढ़ाने वाली हैं। बैंसले ने कहा, ‘हमें जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए। हमें और भी डेटा का इंतजार करने की जरूरत है। मैंने जितने भी साइंटिस्ट्स से बात की है, उन्होंने कहा है कि महामारी के लिहाज से यह अच्छा संकेत नहीं है।’ बैंसेल ने और ज्यादा संक्रमितों के अस्पताल में भर्ती होने की आशंका जताई है। उन्होंने कहा है कि लोगों को काफी समय तक महामारी का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले भी बैंसेल ने कहा था कि नए वेरिएंट के खिलाफ नई वैक्सीन बनकर आने में महीनों लग सकते हैं।
बैंसेल के इस बयान के बाद कोवैक्सिन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक ने कहा कि वह इस बात की स्टडी कर रही है कि उसका टीका ओमीक्रोन वेरिएंट पर असरदार रहेगा या नहीं। कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि हमारी वैक्सीन वुहान में मिले मूल वेरिएंट पर आधारित है। अभी तक यह बाकी वेरिएंट के मामले में असरदार रही है। नए वेरिएंट पर भी हम इसकी जांच कर रहे हैं।
दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका द नेचर में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि द. अफ्रीका में जिन लोगों को ओमीक्रोन का संक्रमण हुआ, उनमें कुछ ने जॉनसन एंड जॉनसन (J&J), कुछ ने फाइजर-बायोएनटेक और कुछ ने ऑक्सफर्ड-एस्ट्राजेनेका (कोविशील्ड) वैक्सीन की डोज ले रखी थी। यानी, ओमीक्रोन ने इन तीनों टीकों को भेदने में सफल रहा है। तो क्या मान लिया जाए कि ओमीक्रोन के सामने वैक्सीन का कोई महत्व नहीं रह गया है? इसका जवाब हमारे सहयोगी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया (ToI) में प्रकाशित मशहूर विषाणु विज्ञानी (Virologist) शाहिद जमील के एक लेख में पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह सच है कि ओमीक्रोन, वैक्सीन के व्यूह को भेदने में सफल हो रहा है, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वैक्सीन बिल्कुल अनुपयोगी हो गया है।
जहां तक बात कोविड मरीजों के इलाज की है तो WHO का कहना है कि पिछले दो सालों में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज की जो पद्धतियां इजाद की गई हैं, उनका ओमीक्रोन मरीजों के लिए भी उपयोगी साबित होना चाहिए। इस वैश्विक संगठन के मुताबिक, कोर्टिकोस्ट्रॉइड्स (Corticosteroids) और आईएल6 रिसेप्टर ब्लॉक करने वाले इलाज के तरीके नए वेरियेंट के मरीजों पर भी कामयाब होने चाहिए। हालांकि, दूसरे तरीकों के इलाज कितने प्रभावी रहेंगे, इसका आकलन करना होगा।
कोरोना वायरस के वेरियेंट्स के नाम यूनानी वर्णमाला (Greek Alphabet) के अक्षरों के क्रम पर रखा जा रहा है। ओमीक्रोन, इस वर्णमाला का 15वां अक्षर है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना वायरस ने एक साल में कितने रूप बदले हैं और उसके म्यूटेशन की रफ्तार कितनी तेज है। इसका पहला बड़ा वेरियेंट अल्फा संभवतः 2020 में मिला था जबकि सालभर बाद ही अक्टूबर 2021 के पहले हफ्ते में ओमीक्रोन वेरियेंट आ गया। ये अलग बात है कि पहली बार यह दक्षिण अफ्रीका में 11 नवंबर को पकड़ में आया। ग्रीक अल्फाबेट का 13वां अक्षर नू (Nu) और शी (Xi) जिनके नाम पर वेरियेंट के नाम नहीं रखे गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा कि लोग नू का मतलब कहीं नया (New) नहीं निकाल लें। उधर, शी चूंकि चीनी राष्ट्रपति का नाम है, इसलिए Xi को छोड़ दिया गया। इस तरह, 13वें वेरियेंट को ग्रीक अल्फाबेट के 15वें अक्षर का नाम मिल गया है।
कोरोना वायरस के मिले अब तक 13 बड़े वेरियेंट्स में पांच को ही वेरियेंट ऑफ कन्सर्न की श्रेणी में रखा गया है। इसमें एक ओमीक्रोन ही शामिल है। इस श्रेणी के वेरियेंट्स ने कोविड-19 महामारी को भयावह रूप देकर जबर्दस्त तबाही मचाई है। बाकी आठ को वेरियेंट ऑफ इंट्रेस्ट की श्रेणी में रखा गया है। यानी, ये वेरियेंट्स ज्यादा खतरनाक नहीं हैं। गौर करने वाली बात है कि ओमीक्रोन को छोड़कर जो चार अन्य वेरियेंट ऑफ कन्सर्न हैं, वो सभी पिछले साल मई से नवंबर महीने के बीच मिले थे। यानी, ओमीक्रोन करीब-करीब एक साल के अंतराल के बाद आया है।
ओमीक्रोन ने एक साल के लंबे अंतराल का इस्तेमाल म्यूटेशनों के साथ मजबूत गठजोड़ करने में किया है। यही वजह है कि अब तक इसके 50 म्यूटेशनों का पता चल चुका है जबकि भारत में कोरोना की दूसरी लहर में तबाही मचाने वाले डेल्टा वेरियेंट के इसके आधे म्यूटेशन मिले थे। ओमीक्रोन के 50 म्यूटेशनों में 32 स्पाइक प्रोटीन में पाए गए हैं जो डेल्टा में 10 थे। यह चिंता बढ़ाने वाली बात है क्योंकि ज्यादातर मौजूदा कोरोना वैक्सीन भी वायरस की पहचान स्पाइक प्रोटीन के जरिए ही करती हैं। अब जब स्पाइक प्रोटीन में ही म्यूटेशन आ गया तो वैक्सीन को वायरस की पहचान करने में मुश्किल आएगी। यही वजह है कि ओमीक्रोन के कोरोना वैक्सीन को भी बहुत हद तक निष्प्रभावी करने की बातें हो रही हैं। चिंता की एक और बात है कि स्पाइक प्रोटीन के उस हिस्से में भी ओमीक्रोन के 10 म्यूटेशन पाए गए हैं, वायरस जिसका इस्तेमाल इंसानी शरीर के उत्तकों (Cells) में घुसने के लिए करता है। डेल्टा में ऐसे सिर्फ दो म्यूटेशन पाए गए थे। इन्हीं वजहों से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ओमीक्रोन को तुरंत वेरियेंट ऑफ कन्सर्न घोषित कर दिया।
ओमीक्रोन ने इतने म्यूटेशन कर लिए कि इसने संक्रमण फैलाने की रफ्तार के मामले में अब तक के सभी वेरियेंट ऑफ कन्सर्न की श्रेणी वाले वेरियेंट्स को पीछे छोड़ दिया। प्रतिष्ठित विषाणु विज्ञानी शाहिद जमील ने हमारे सहयोगी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया (ToI) में लिखे अपने लेख में कहा था, ‘ओमीक्रोन सेल में प्रवेश दिलाने वाले स्पाइक प्रोटीन के हिस्से में भी काफी म्यूटेशन कर लिए हैं। इंसानी उत्तकों (Human Cells) में वायरस जितना आसानी से प्रवेश करेगा, उतनी ज्यादा उसकी संख्या बढ़ेगी और उतनी ज्यादा रफ्तार से दूसरे लोगों को संक्रमित भी कर पाएगा।’
हालांकि कुछ शुरुआती खबरों में कहा गया कि ओमीक्रोन संक्रमण फैलाने के लिहाज से डेल्टा के मुकाबले छह गुना तेज है, लेकिन अभी इसकी पुष्टि के लायक पर्याप्त आंकड़े नहीं मिल पाए हैं। WHO ने अब तक यही कहा है कि ओमीक्रोन ज्यादा संक्रामक है और इसके गंभीर नतीजे देखने को मिल सकते हैं। उधर, द. अफ्रीका के ग्वांतेंग प्रांत में ओमीक्रोन का संक्रमण तेजी से बढ़ा भी है। वहां स्कूली बच्चे और नौजवान इस वेरियेंट के शिकार हुए हैं। 12 से 20 नवंबर के बीच जमा किए गए सभी 77 नमूनों में ओमीक्रोन वेरियेंट ही मिला है।
डेल्टा के मुकाबले यह संभवतः तेजी से फैलता है, लेकिन यह अन्य वेरियेंट्स ऑफ कन्सर्न के मुकाबले कितना जानलेवा साबित होगा, यह अभी तक पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। द. अफ्रीका में सरकार को इस वेरियेंट के प्रति सतर्क करने वाली डॉ. एंजेलिक कोएट्जी ने कहा कि ओमीक्रोन से संक्रमित मरीजों में बीमारियों के मध्यम लक्षण दिखते हैं। उन्होंने बीबीसी को बताया कि उनके सामने आए ओमीक्रोन संक्रमित पहले मरीज को बहुत थकान थी और उसके शरीर और सिर में दर्द था। उसने गले में खरास तो थी, लेकिन कफ की समस्या नहीं थी। सूंघने और स्वाद की क्षमता भी नहीं गई थी। डॉ. कोएट्जी ने बताया कि उस मरीज का पूरा परिवार संक्रमित निकला और सभी में मध्यम लक्षण ही दिखे।
लॉकडाउन के असर पर सवाल
स्वामी अंकलेश्वर के मुताबिक, ओमीक्रोन का खतरा बढ़ जाए और तब बहुत जरूरी लगने लगे तो लॉकडाउन पूरे देश, राज्य या जिला स्तर पर लगाने के बजाय प्रभावित इलाके में लगाया जाए। लॉकडाउन में स्कूल जैसे संस्थानों को खुला रखा जाए और पूरा प्रयास रहे कि ज्यादा से ज्यादा आर्थिक-सामाजिक गतिविधियां चालू रहें। वो कहते हैं, अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि एक देश से दूसरे देश में यात्रा प्रतिबंध से पर्यटन और कारोबार को बहुत नुकसान होता है, फिर भी वायरस देशों की सीमा लांघता ही रहता है। कुछ देश अफ्रीका की उड़ानें रोक रहे हैं क्योंकि ओमीक्रोन वहीं मिला, लेकिन सच यह है कि यह यूरोप और अमेरिका में भी पहुंच चुका है जो भारत में भी आ सकता है।
टीकाकरण ही सर्वोत्तम उपाय
लेखक के मुताबिक, ऐसे हालात में टीकाकरण ही सर्वोत्तम प्रभावी उपाय है। उन्होंने लेख में कहा है कि भारत में 70% आबादी को टीके की दो खुराक देने का लक्ष्य पर्याप्त नहीं है। सरकार को तीसरा बूस्टर डोज देने और सालाना वैक्सीन लगवाने पर विचार करना होगा। संभव है कि एक व्यक्ति को कभी किसी ब्रैंड की तो कभी दूसरे ब्रैंड की वैक्सीन लगाना ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध हो। एचआईवी के खिलाफ वैक्सीन कॉकटेल काफी कारगर साबित हो चुका है। उनका कहना है कि आखिरकार भविष्य में कोरोना वायरस के और कितने वेरियेंट्स आएंगे और वो कितने खतरनाक होंगे, इसका अंदाजा कैसे लगाया जा सकता है? वैसे भी कोई भी टीका कोरोना वायरस के खिलाफ 100% सुरक्षा तो दे नहीं सकता है। तो क्या बार-बार लॉकडाउन लगता रहेगा? जिस तरह दुनिया ने अन्य कई कारणों से हो रही मौतों के बावजूद जीना सीख लिया है, हमें उसी तरह का नजरिया कोविड के प्रति भी विकसित करना होगा।