आखिर मजदूर ही मजबूर क्यों : डॉ आशीष मौर्य

फरीदाबाद : मजदूर जिसे श्रमिक भी कहते हैं मानवीय शक्ति, दिमागी सोच, शारीरिक, व मानसिक बल और अपने प्रयासों से जो भी कार्य करने वाला होता है वास्तव में वही मजदूर है,, या फिर दूसरे शब्दों में कह सकते हैं अपनी मानवीय शक्ति को बेचकर कुछ पैसे अर्जित करने वाला ही मजदूर कहलाता है,, मजदूर का मतलब ही मजबूरी है, देश की आर्थिक उन्नति में इसी तबके का बहुत बड़ा योगदान है, यही मजदूर अपने दो वक्त की रोटी के लिए परिवार व बच्चों के पालन पोषण के लिए ना जाने कितने मीलो दूर अपने मातृभूमि और जन्म भूमि से हटकर अपने शरीर की परवाह ना करते हुए सुख सुविधाओं का ध्यान न रखते हुए अपने मानवीय शक्तियों का प्रयोग कर उस शहर देश और उस उद्योग को बढ़ाने का कार्य करता है,, मजदूर, किसान वर्ग का योगदान हमेशा ही अतुलनीय और सराहनीय ही रहा है,, वर्तमान समय में पूरे विश्व में फैली वैश्विक महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है,

 

बीमारी ऐसी की सारे उद्योग कल कारखाने छोटी से छोटी वा बड़ी से बड़ी इकाई पूरी तरह से ठप पड़ गई,, मानव जीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया,, शहरों की रौनक बढ़ाने वाले यही मजदूर जीने की कोई आस ना दिखाई पड़ने की वजह से पुनः अपने गांव की तरफ चलने को मजबूर है ,,एक ही सपना के अंतिम चरण में रहे तो अपने मातृभूमि पर ही पर एक सवाल आता है हर जगह मजदूर ही मजबूर क्यों होता है,,, इन्हें क्यों बेबसी या फिर समस्या का सामना करना पड़ता है,, क्या इनका देश की उन्नति आर्थिक उन्नति में कोई योगदान नहीं है,, दुख तो तब होता है जब सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए ना जाने कितने ताने-बाने बुनने लगती है,,

 

देश की वर्तमान स्थिति इस तरह है,, तो मजदूर अपने शहरों से अपने घर की तलाश तरफ से पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं ना तो उनके पास खाने को है, ना तो पीने को है सरकारी तो सिर्फ अपनी वाहवाही में ही बिजी हैं,,, वर्तमान में राष्ट्रीय राजमार्गों पर देश के कर्णधार व उनके छोटे बच्चे भूखे प्यासे नंगे पैर सड़क हो से अपने घर जाने को मजबूर हैं,,,, आखिर इनका दोष क्या है,,,, खैर सवाल तो बहुत हैं अंततः यही है कुछ भी हो हर हाल में देश का मजदूर और किसान ही मजबूर होता है,, केंद्र सरकार व राज्य सरकार को इनकी मजबूरियों को ध्यान में रखकर कुछ ऐसी योजना बनानी चाहिए कि, वैश्विक महामारी में कोई भी परिवार भूखा ना रहे,,,

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