फरीदाबाद : प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा का क्या अर्थ है। यह एक शब्दहीन अवस्था है। यह वह अनुभव जो आत्मा के स्तर पर किया जाता है। इसका अर्थ अपने समस्त आपे को प्रभु प्रेम से भर देता है। प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा, हमारी आत्मा का प्रभु से मिलाप का अर्थ है। लेकिन हम इसे और कैसे विकसित कर सकते हैं। प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा की विकास करने की प्रक्रिया उन बाधाओं और हलचनो को दूर करना है जो हमें उन अंतर्मुख वास्तविक अवस्था को पाने से रोकते हैं। प्रेम और श्रद्धा वह रहस्यमय कूंजी है जिससे हमारी आत्मा का मिलाप परमात्मा से हो सकता है। प्रभु प्रेम है और हमारी आत्मा भी प्रेम है। दोनों के बीच मध्यस्थता का पुल, प्रभु की ज्योति और श्रुति जो दोनों को जोड़ता है, वह भी प्रेम है। हम प्रभु की ज्योति और श्रुति से कैसे संपर्क कर सकते हैं।
ध्यान अभ्यास एक भौतिक प्रक्रिया नहीं है क्योंकि भौतिक विज्ञान तो भौतिक संसार के नियमों के अनुसार काम करता है। प्रभु आत्मा, ज्योति एवं श्रुति चेतन है, इस भौतिक जगत से परे है। जब हम अंतर्मुख ज्योति और श्रुति की धारा को साथ जोड़ते हैं, हमारी आत्मा इस धारा पर सवार होकर प्रभु के पास पहुंच जाती है, जहां से यह प्रवाहित होती है। इसी तरह प्रेम भी भौतिक अवस्था नहीं है। यह आत्मा की अवस्था है। दिव्य प्रेम, आत्मा की, परमात्मा की, ज्योति और श्रुति की अवस्था है। जब हम ध्यान अभ्यास करते हैं,हम दिव्य प्रेम की अवस्था में लीन हो जाते हैं। हमारा उस अवस्था में लीन होना ही श्रद्धा है। फिर वह क्या है जो हमें इस प्रेम से दूर रख रहा है ? हमारा मन और अहंकार जो लगातार हस्तक्षेप कर रहे हैं ताकि हम उस दिव्य प्रेम से ना जुड़ पाएँ । वे लोग जिनके पास सोचने के लिए बहुत कुछ होता है , उन्हें मन को शांत करना मुश्किल लगता है ।
अगर हम अपनी साँस ओफ़ दिल की धड़कन मैं प्रेम ओर शृधा का विकास कर सकें , तो हम प्रभु की गोद मैं वापिस पहुँच जाएँगे ध्यान-अभ्यास की सफलता प्रभु के प्रति हमारे प्रेम ओर श्रद्धा पर निर्भर करती है । जितना अधिक अन्तरीय ज्योति श्रुति पर ध्यान टिकाते हैं, इसमें डुबकी लगाते हैं उतना ही अधिक प्रभू -प्रेम हमारे अंतर मैं हिलोरें मारता है । समय के साथ , हम प्रभू की प्रेम की सराहना करने लगते हैं। अंतत:जब हम प्रभू के प्रति प्रेम विकसित करते हैं , तो ध्यान अभ्यास के निर्देशकों को गंभीरता से लेते हैं । जब हम ऐसा करते हैं , तब हम अपनी रूहानी तरक़्क़ी मैं परीणाम देखना शुरू करते हैं ।
जब हम उस बिंदु पे पहूँच जाते हैं जहां हम अपने मन ओर अहंकार से अपनी इच्छाओं के बजाय प्रभू से अधिक प्रेम करते हैं हम प्रभू पे प्रति आकर्शित हो जाते हैं और आध्यात्मिक तरक़्क़ी करते हैं । हमें सिर्फ प्रभू के प्रति प्रेम व श्रद्धा विकसित करने की आवशयकता है । आइए ! हम ध्यान अभ्यास , निष्काम सेवा एवं स्वयं में सदाचारी गुणों का विकास करके प्रभू के प्रति अपना प्रेम और श्रद्धा दर्शाएँ।
